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CG NEWS: छत्तीसगढ़ के इस जिले को पूरे हुए 14 साल… लेकिन अब भी मूलभूत सुविधाएं यहां के लिए सपना!

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना को 25 साल पूरे हो गए हैं. वहीं गरियाबंद जिला भी आज अपने गठन के 14 साल पूरे कर चुका है. लेकिन जिले का मुख्यालय आज भी कई मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है. कलेक्टर से लेकर अन्य अधिकारी तक सरकारी आवास के अभाव में किराए के मकानों में रह रहे हैं. ऐसे में जब 5 नवंबर तक राज्य उत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं, तब मुख्यालय में मौजूद कई कमियां उत्सव का मुंह चिढ़ा रही है. जनता के मन में भी सवाल उठ रहे हैं- “ऐसे में कैसे मनाएं उत्सव?”

जिला अस्पताल बना रेफर सेंटर

कहने को तो गरियाबंद में जिला अस्पताल है, लेकिन 14 साल में अब तक इसका अपना भवन नहीं बन सका. सीएचसी भवन में जोड़-तोड़ कर अस्पताल संचालित किया जा रहा है. अस्पताल में न आईसीयू है, न सोनोग्राफी की सुविधा, न ही गायनेकोलॉजिस्ट या एनेस्थीसिया विशेषज्ञ. पुराने भवन में फायर सेफ्टी मानकों की भी अनदेखी की जा रही है. गंभीर मरीजों को रायपुर रेफर कर दिया जाता है. नए अस्पताल भवन का निर्माण ठेका कंपनी की धीमी रफ्तार और मनमानी के कारण वर्षों से अधूरा है.

न्याय व्यवस्था भी अधूरी

14 साल बाद भी जिले में पूर्ण न्यायालय की स्थापना नहीं हो सकी है. फिलहाल सिर्फ सिविल न्यायालय से काम चलाया जा रहा है. श्रम, विद्युत, भ्रष्टाचार, परिवार, महिला, एससी-एसटी और एनडीपीएस जैसे मामलों की सुनवाई राजधानी रायपुर में होती है. इससे पक्षकारों को अतिरिक्त खर्च और समय की परेशानी झेलनी पड़ती है.

बस स्टैंड और गार्डन का अभाव

जिला मुख्यालय में आज तक व्यवस्थित बस स्टैंड नहीं बन सका है. साईं मंदिर प्रांगण को छोड़ कोई बड़ा उद्यान नहीं है. वन विभाग द्वारा 50 लाख से अधिक खर्च कर विकसित किया गया ऑक्सी जोन पार्क भी अधूरा है. गेट पर अक्सर ताला लटका रहता है और लोग अब भी सैर-सपाटे के लिए नेशनल हाइवे का सहारा लेते हैं.

डायवर्शन रोक से विकास थमा

नगर निवेश विभाग की अनुपस्थिति और जमीन के डायवर्शन पर रोक ने जिले में निजी निर्माण कार्यों को ठप कर दिया है. जिन लोगों ने प्लॉट खरीदे हैं, वे न तो मॉर्गेज कर पा रहे हैं और न ही लोन ले पा रहे हैं. अवैध प्लॉटिंग से शासन को राजस्व नुकसान झेलना पड़ रहा है. इससे मध्यमवर्गीय परिवारों का घर का सपना अधूरा रह गया है.

कलेक्टर आवास की मंजूरी भी अधूरी

जिले में अब तक 14 कलेक्टर बदले गए, लेकिन कोई भी अपने आधिकारिक आवास की मंजूरी नहीं दिला सका. ट्रांजिट हॉस्टल और हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनी होने के बावजूद संख्या पर्याप्त नहीं है. नतीजतन, करीब 30 से 40 अफसर-कर्मी किराए के मकानों में रहते हैं, जबकि कुछ को रायपुर से रोजाना आना-जाना पड़ता है.

राज्य उत्सव की तैयारियों के बीच गरियाबंद की ये अधूरी तस्वीर जनता और व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े कर रही है — आखिर गरियाबंद 14 साल बाद भी क्यों अधूरा है?

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